भारत में राम मंदिर का निर्माण सिर्फ एक धार्मिक परियोजना नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संघर्ष और सामूहिक संकल्प का परिणाम था। यह आंदोलन लगभग पाँच दशकों तक चला और अंततः 2024 में इतिहास ने वह क्षण देखा जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर राष्ट्र के सामने स्थापित हुआ।
लेकिन एक अहम सवाल आज भी खड़ा है — क्या सिर्फ राम मंदिर का निर्माण ही सांस्कृतिक पुनर्जागरण था? क्या भारतीय समाज अब पूरी तरह से अपनी जड़ों के साथ खड़ा है?
लोगों का कहना है कि राम मंदिर बनाना आसान था, लेकिन मैकाले के बनाए गए ढांचे को गिराना बहुत कठिन है। यह ढांचा सिर्फ कोई इमारत या संरचना नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन द्वारा थोपी गई मानसिकता, शिक्षा प्रणाली और सांस्कृतिक अलगाव का प्रतीक है।
मैकाले का ढांचा क्या था?
थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने 1835 में भारतीय शिक्षा नीति का आधार तय किया था। उसकी सोच यह थी कि भारत में एक ऐसा वर्ग तैयार किया जाए जो—
- “खून से भारतीय, पर सोच से अंग्रेज” हो।
- अपनी जड़ों, धर्म, इतिहास और संस्कृति से कट चुका हो।
- पश्चिमी ज्ञान को श्रेष्ठ और भारतीय विद्या को हीन समझे।
यह ढांचा सिर्फ स्कूलों में नहीं, बल्कि विचारों, भाषा, प्रशासन और सामाजिक संरचना तक फैल गया।
राम मंदिर: आस्था का पुनरुद्धार
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारत की सांस्कृतिक आत्मा की पुनर्स्थापना का एक प्रतीक है।
यह दर्शाता है कि—
- भारतीय समाज अपनी जड़ों को पुनः पहचान रहा है
- अपनी धार्मिक पहचान पर गर्व कर रहा है
- ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने की क्षमता रखता है
लेकिन एक मंदिर बनने से मानसिकता नहीं बदलती।
यहाँ समस्या ज्यादा गहरी है—क्योंकि मैकाले का ढांचा आंखों से नहीं, दिमाग और जीवनशैली में मौजूद है।
क्यों मैकाले का ढांचा गिराना कठिन है?
1. शिक्षा व्यवस्था अभी भी औपनिवेशिक है
भारत की मौजूदा शिक्षा प्रणाली में—
- भारत का इतिहास आधा-अधूरा पढ़ाया जाता है
- पश्चिमी विचारों को अधिक महत्व मिलता है
- भारतीय दर्शन, वेद, उपनिषद और संस्कृति को सीमित संदर्भ में बताया जाता है
नई पीढ़ी अपने गौरवशाली अतीत से पूरी तरह परिचित नहीं हो पाती।
2. भाषा की दुविधा – हिंदी या अंग्रेज़ी?
भारत में अंग्रेज़ी अभी भी “एलीट” की भाषा मानी जाती है।
मैकाले की यही सोच थी कि भारतीय अंग्रेज़ी को अपनाकर खुद पर गर्व महसूस करें और अपनी मातृभाषाओं को कमतर समझें।
3. मीडिया और मनोरंजन में पश्चिमी प्रभाव
आज भी बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि—
- पश्चिमी जीवनशैली ही आधुनिकता है
- भारतीय संस्कृति पुरानी और पिछड़ी है
यह मानसिकता वर्षों की मैकालेवादी सोच का नतीजा है।
4. आत्महीनता की भावना
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि खुद भारतीय ही अपनी संस्कृति को बेहद कम आंकते हैं।
मैकाले के भाषण का यह असर आज भी दिखता है।
लोग पश्चिमी फैशन, भाषण और आदतों को श्रेष्ठ समझते हैं।
राम मंदिर ने क्या बदला?
राम मंदिर ने राष्ट्र को नई ऊर्जा दी है।
इसने समाज को यह एहसास कराया कि—
- इतिहास चाहे कितना भी दबा दिया जाए, सत्य एक दिन सामने आता है
- संस्कृति की नींव जितनी पुरानी होती है, उतनी ही मजबूत होती है
लेकिन, सिर्फ मंदिर बनना ही काफी नहीं।
अब असली लड़ाई विचारों के स्तर पर है।
क्यों जरूरी है मैकाले की मानसिकता को तोड़ना?
भारतीय शिक्षा पर भारतीयों का अधिकार
जब तक शिक्षा भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं होगी, तब तक भारतीय बच्चे अपने अतीत और पहचान से दूर रहेंगे।
सांस्कृतिक आत्मविश्वास का निर्माण
राम मंदिर राष्ट्रीय आत्मविश्वास का प्रतीक है।
लेकिन यह आत्मविश्वास तभी टिकेगा जब आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों को समझेगी।
सभ्यता और मूल्यों की रक्षा
मैकाले का ढांचा भारत की मूल शिक्षण परंपरा — गुरुकुल, वेद, योग, आयुर्वेद — को पिछड़ा कहलाता है।
इस मानसिकता को बदले बिना समाज सही दिशा नहीं पकड़ पाएगा।