उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले से एक बहुत ही दुखद खबर सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है। बिंदकी तहसील के खजुहा कस्बे में तैनात 25 वर्षीय लेखपाल सुधीर कुमार कोरी ने अपनी शादी से एक दिन पहले अपने घर में फांसी लगाकर जान दे दी। परिवार का आरोप है कि यह कदम उन पर डाले गए काम के असह्य दबाव का नतीजा था, खासकर कानूनगो की ओर से।
तनाव और काम का बोझ – हादसे की वजह
परिवार के अनुसार, सुधीर की ड्यूटी SIR (मतदाता विशेष पुनरीक्षण) प्रोजेक्ट में थी, जहां वह सुपरवाइज़र की भूमिका में काम कर रहा था। AajTak की रिपोर्ट में बताया गया है कि शादी की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, लेकिन सुधीर को छुट्टी नहीं दी गई थी, जिससे वह तनाव में था। AajTak
जागरण अख़बार की खबर के मुताबिक़, सुधीर ने शादी के लिए सात दिन की छुट्टी मांगी थी, लेकिन उनका दावा है कि छुट्टी स्वीकृत न होते हुए भी उन्हें काम का दबाव बढ़ाया गया था। Jagran
कानूनगो पर गंभीर आरोप
घटना के दिन-सुबह, सुधीर के घर कानूनगो आए और उन्होंने काम के लिए उसपर पुनः दबाव डाला। सुधीर की बहन अमृता ने आरोप लगाया है कि कानूनगो ने चेतावनी दी थी — अगर एक दिन ड्यूटी पर न गए, तो निलंबन की कार्रवाई हो सकती है।
परिवार का कहना है कि इसी के बाद सुधीर अपने कमरे में गया, दरवाजा बंद किया और फांसी लगा ली। उन्होंने तुरंत कार्रवाई की मांग करते हुए एफआईआर दर्ज कराने की जिद दी, और शव उठाने से इनकार कर दिया।
प्रशासन और पुलिस की प्रतिक्रिया
घटना की जानकारी मिलते ही एसडीएम, तहसीलदार और राजस्व विभाग की टीम मौके पर पहुंच गई। पोस्टमॉर्टम के लिए शव को भेजा गया है, और पुलिस मामले की तह तक जाने के लिए जांच कर रही है।
लेखपाल संघ और परिजन ईआरओ / निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) पर भी ज़ोरदार आरोप लगा रहे हैं। जागरण की रिपोर्ट में कहा गया है कि संघ ने दावा किया है कि सुपेरवाइज़र ईआरओ ने सुधीर को “मतदाता रेव्यू अभियान” में लगातार दबाव में रखा था और नौकरी जाने की धमकी दी थी।
परिवार का दर्द — शादी का सपना टूटा
सुधीर की शादी 26 नवंबर को तय थी। ये खुशी का मौका था, लेकिन अचानक सूनापन और खालीपन ने घर को घेरे लिया। AajTak की रिपोर्ट में बताया गया है कि सुधीर के गृहनगर में पहले बारात घर में रस्में चल रही थीं, मातृ पूजन और मेहँदी की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं, लेकिन अगले ही दिन दुःख की खबर ने सबको हिलाकर रख दिया।
परिजन यह सवाल उठाते हैं: क्या सिर्फ काम का दबाव इतना था कि उसने अपनी ज़िंदगी ही खत्म कर दी? उनकी मांग है कि कानूनगो और उसके अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो।
क्यों यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि सिस्टम का सच है?
यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की आत्महत्या नहीं है — यह एक बड़े प्रशासनिक और मानसिक स्वास्थ्य मुद्दे की परत खोलती है:
- अत्यधिक काम का दबाव — SIR जैसी सरकारी प्रक्रियाओं में काम करने वाले कर्मचारियों को अक्सर किसी दिन छुट्टी देना व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाता है।
- खतरे की चेतावनी — यदि कर्मचारियों को धमकी दी जाए कि अवकाश लेने पर नौकरी जाने का डर रहेगा, तो वह लगातार तनाव में रहते हैं।
- मानव मूल्य बनाम राज्य की ज़रूरतें — कर्मचारी न केवल “काम करने वाला एजेंट” है, बल्कि इंसान है, जिसकी व्यक्तिगत ज़िंदगी और भावनाएं भी मायने रखती हैं।
- न्याय की मांग — सुधीर के परिवार ने एफआईआर की मांग की है और प्रशासन से जवाबदेही की अपील की है।
निष्कर्ष
फतेहपुर की यह घटना हमें एक बड़ी सच्चाई स्मरण कराती है: सरकारी सिस्टम में काम करने वाले कर्मचारी भी मानवीय सीमाएं रखते हैं। जब यह दबाव व्यक्तिगत ज़िंदगी पर छा जाए, तो परिणाम बेहद दुखद हो सकते हैं। सुधीर कुमार कोरी की इस आत्महत्या ने न सिर्फ एक परिवार की खुशियों को मौत में बदल दिया, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरे सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
परिजनों की मांग यह है कि कानूनगो और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जल्द से जल्द एफआईआर हो और दोषियों को सज़ा मिले, ताकि ऐसी घटनाओं को दोबारा रोका जा सके। उनके अनुसार, सिर्फ़ वह न्याय वही हो सकता है जो इस दर्द को समझे और भविष्य में ऐसे हादसों को रोक सके।
फतेहपुर में इस मामले की जांच अभी जारी है, और जिले के बुजुर्गों, लेखपाल संघ और स्थानीय प्रशासन में भी रणनीति बन रही है कि कैसे इस घटना को केवल एक समाचार न बनाकर सुधार की दिशा में कदम माना जाए।