देश का सबसे लोकप्रिय साहित्यिक महोत्सव ‘साहित्य आजतक’ अपने दूसरे दिन और भी ज्यादा ऊर्जा, उत्साह और रचनात्मकता के साथ आगे बढ़ा। सुबह से लेकर शाम तक कई बड़े सत्र आयोजित हुए, जिनमें देशभर से आए साहित्यकारों, फिल्म कलाकारों, कवियों, गीतकारों और नए दौर के क्रिएटर्स ने हिस्सा लिया। दूसरे दिन का माहौल हर दिशा से साहित्य, कला, संगीत और विचारों की खुशबू से भरा नजर आया। खास बात यह थी कि मंच पर अमोल पालेकर, मनोज मुंतशिर, जैसे कई अनुभवी और प्रतिष्ठित नामों ने शिरकत की और अपने विचारों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अमोल पालेकर ने कला और समाज पर रखे अपने अनमोल विचार
दूसरे दिन की शुरुआत हिंदी सिनेमा के एक बड़े और सम्मानित नाम अमोल पालेकर के शानदार सत्र से हुई। अभिनेता, निर्देशक और पेंटर—अमोल पालेकर ने अपने लंबे करियर के कई अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि कैसे भारतीय सिनेमा में बदलाव आया है, और आज की पीढ़ी किस तरह कला को नई दिशा दे रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने का भी एक तरीका है। पालेकर ने अपने पुराने दिनों की फिल्मों, थिएटर और अपनी व्यक्तिगत यात्रा पर खुलकर बात की।
दर्शकों ने उनकी सरलता, विनम्रता और गहराई से भरे संवादों की खूब सराहना की।
मनोज मुंतशिर की कविता, दर्द और शब्दों का जादू
प्रसिद्ध गीतकार, लेखक और शायर मनोज मुंतशिर का सत्र Day 2 का मुख्य आकर्षण रहा। जब वे मंच पर आए, तो सभागार तालियों से गूंज उठा।
उन्होंने अपनी मशहूर शायरियां सुनाईं, अपने गीतों के पीछे की कहानियां शेयर कीं और यह भी बताया कि आज की दुनिया में शब्दों की ताकत कैसे पहले से भी ज्यादा बढ़ गई है।
मनोज मुंतशिर ने अपने संघर्ष के दिनों का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे छोटे-छोटे अनुभव भी बड़े लिखने का आधार बनते हैं।
उन्होंने अपनी भावनात्मक कविता “तेरी मिट्टी” और कई लोकप्रिय गीतों के निर्माण की कहानी भी सुनाई, जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया।
नई और पुरानी पीढ़ी के लेखकों की शानदार मौजूदगी
साहित्य आजतक का दूसरा दिन केवल बड़े नामों तक सीमित नहीं रहा। मंच पर कई युवा लेखक, कवि और कंटेंट क्रिएटर्स भी पहुंचे।
उन्होंने अपनी किताबों, कविताओं और कहानियों के जरिए युवा सोच को सामने रखा।
युवा पीढ़ी द्वारा उठाए गए मुद्दों में शामिल थे:
- महिलाओं के अधिकार
- सामाजिक समानता
- आधुनिक रिश्ते
- डिजिटल दुनिया और कंटेंट क्रिएशन
- बदलती राजनीतिक सोच
इन विषयों पर हुई चर्चाओं ने दर्शकों को नए नजरिए प्रदान किए।
राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक बहसों से भरा दिन
दिवस 2 पर केवल साहित्य ही नहीं, बल्कि समाज और राजनीति से जुड़ी कई संजीदा चर्चाएं भी हुईं।
गौरतलब सत्रों में पत्रकारों, पैनलिस्टों, राजनीतिक विश्लेषकों और सामाजिक चिंतकों ने भाग लिया।
मुख्य मुद्दे थे:
✔️ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
✔️ देश का बदलता राजनीतिक परिदृश्य
✔️ डिजिटल मीडिया बनाम पारंपरिक मीडिया
✔️ साहित्य का भविष्य
✔️ समाज में लेखकों की भूमिका
इन चर्चाओं में दर्शकों ने भी सवाल पूछकर अपनी जिज्ञासाएं जाहिर कीं।
कविता और शायरी के सेशनों ने लूटा दिल
Day 2 में कवियों की महफिल भी बेहद खास रही। मंच पर कई स्थापित और उभरते हुए कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं।
शाम के समय आयोजित शायरी सत्र में दर्शकों की भारी भीड़ मौजूद रही, जिसने हर ग़ज़ल, नज़्म और कविता पर तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया।
कविताएं थीं:
- प्रेम की भावनाओं पर
- देशभक्ति पर
- समाजिक बदलाव की मांग पर
- व्यक्तिगत संघर्ष पर
इन रचनाओं ने माहौल को बेहद भावनात्मक और सुंदर बना दिया।
सिनेमा और साहित्य के जुड़ाव पर भी हुई खास चर्चा
Day 2 में यह भी चर्चा हुई कि कैसे सिनेमा और साहित्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
लेखकों और निर्देशकों ने बताया कि हर अच्छी फिल्म की नींव एक मजबूत कहानी होती है, और कहानी की ताकत आज भी साहित्य से ही निकलती है।
अमोल पालेकर और अन्य वक्ताओं ने कहा कि फिल्मों में साहित्य का महत्व सदियों से कायम है और आने वाले समय में यह रिश्ता और भी मजबूत होगा।
दर्शकों की बड़ी भागीदारी ने बढ़ाई रौनक
दूसरे दिन साहित्य आजतक के आयोजन स्थल पर सुबह से ही भारी भीड़ देखने को मिली।
युवा, बुजुर्ग, छात्र, पाठक—हर तरह के लोग इस उत्सव का हिस्सा बने।
सबने अपने पसंदीदा लेखकों से मुलाकात की, किताबें खरीदीं, और साहित्य के खजाने में डूबे रहे।