कर्नाटक कांग्रेस संकट के बीच राहुल से मिले कई नेता, प्रियांक खड़गे की 20 मिनट अलग से मुलाकात

कर्नाटक की राजनीति में इन दिनों उथल-पुथल बढ़ती जा रही है। कर्नाटक कांग्रेस संकट ने राज्य की सरकार और पार्टी दोनों के भीतर बेचैनी पैदा कर दी है। लगातार सामने आ रही असहमति, बयानबाज़ी और संगठनात्मक टकराव के बीच कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात की। इस राजनीतिक हलचल में सबसे ज्यादा ध्यान खींचा प्रियांक खड़गे की 20 मिनट की अलग मुलाकात ने, जिसने प्रदेश कांग्रेस की आंतरिक स्थिति और संभावित फैसलों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। Aajtak

क्यों गहराया कर्नाटक कांग्रेस संकट?

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार के बीच शक्ति संतुलन का मुद्दा उठा रहा है। मंत्रिमंडल विस्तार, विभागों का बंटवारा, क्षेत्रीय असंतोष और संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर कई नेताओं ने नाराजगी भी जाहिर की।

बीते कुछ हफ्तों में हालात और बिगड़ गए जब कई विधायक और मंत्री पार्टी के निर्णयों से असहमत नज़र आए। इसने पार्टी हाईकमान को स्थिति पर गंभीरता से ध्यान देने के लिए मजबूर कर दिया।

कर्नाटक कांग्रेस संकट शब्द अब हर राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन चुका है, और इससे पार्टी नेतृत्व पर स्थिति को स्थिर करने का दबाव और बढ़ गया है।

राहुल गांधी से मुलाकात: नेता क्या संदेश देना चाहते थे?

दिल्ली में कांग्रेस के कई वरिष्ठ और असंतोष जताने वाले नेताओं ने इस संकट के बीच राहुल गांधी से भेंट की। मुलाकात का उद्देश्य था—

  • अपनी नाराजगी सीधे हाईकमान के सामने रखना,
  • शक्ति संतुलन में सुधार की मांग करना,
  • जमीनी स्तर पर बढ़ रही असंतुष्टि का समाधान खोजने हेतु सलाह देना।

नेताओं ने राहुल गांधी को बताया कि कर्नाटक कांग्रेस के भीतर संवाद की कमी और कुछ फैसलों का एकतरफा होना कई विधायकों को असहज कर रहा है। यह भी कहा गया कि यदि समय रहते हालात नहीं संभाले गए, तो विपक्ष इसका राजनीतिक फायदा उठाएगा।

प्रियांक खड़गे की 20 मिनट अलग मुलाकात—क्यों महत्वपूर्ण?

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे और कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खड़गे ने राहुल गांधी से लगभग 20 मिनट तक अलग बैठक की। यह मुलाकात इसलिए खास मानी जा रही है क्योंकि:

  1. अलग से मिलने का मतलब है कि मुद्दे बेहद संवेदनशील और रणनीतिक महत्व के थे।
  2. प्रियांक खड़गे कर्नाटक की सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए उनका इनपुट हाईकमान के लिए अहम है।
  3. चर्चा में पार्टी नेतृत्व, सरकार के प्रदर्शन, विभागीय मतभेद और भविष्य की रणनीति जैसे मुद्दे शामिल होने की संभावना है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि खड़गे की यह मुलाकात इस संकेत की तरह है कि हाईकमान अब कर्नाटक कांग्रेस संकट को हल करने के लिए सीधी निगरानी और हस्तक्षेप करेगा।

हाईकमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती—संतुलन बनाए रखना

कर्नाटक कांग्रेस सरकार दो शक्तिशाली नेताओं—सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार—के सह-अस्तित्व पर निर्भर है। दोनों के समर्थक समूह लगातार अपनी-अपनी मांगें रखते रहे हैं।
हाईकमान के लिए चुनौती यह है कि:

  • नेतृत्व और पदों के बंटवारे में संतुलन कैसे बनाया जाए,
  • सरकार और संगठन दोनों मजबूत बने रहें,
  • असंतुष्ट विधायकों को मनाया जा सके,
  • भाजपा और जेडीएस को राजनीतिक मौका न मिले।

इसीलिए दिल्ली में हुई नेताओं की मुलाकातों को पार्टी संकट प्रबंधन की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

कांग्रेस की रणनीति: संकट को शांत करने की कोशिश

राहुल गांधी और खड़गे ने सभी नेताओं को स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी अनुशासन सर्वोपरि है और जनहित से ऊपर कोई व्यक्तिगत मुद्दा नहीं हो सकता।
साथ ही, यह भी संकेत मिला है कि:

  • मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल पर विचार हो सकता है,
  • असंतुष्ट विधायकों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है,
  • पार्टी संगठन में बदलाव के संकेत भी जल्द मिल सकते हैं।

हाईकमान का उद्देश्य है कि कर्नाटक कांग्रेस संकट को जल्द समाप्त कर राज्य सरकार को स्थिरता के साथ आगे बढ़ाया जाए।

राजनीतिक हलचल से जनता में क्या संदेश जा रहा?

राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं है, यह जनता के विश्वास का भी मामला है।
जब सरकार के भीतर असहमति सामने आती है, जनता भ्रमित होती है। विपक्ष इसका फायदा उठाने के लिए हर मौके की तलाश में है।
कर्नाटक जैसे बड़े राज्य में अस्थिरता का असर न केवल सरकारी योजनाओं पर पड़ेगा, बल्कि आगामी लोकसभा चुनावों में भी इसका असर दिख सकता है।

क्या आगे बड़े बदलाव संभव हैं?

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:

  • कर्नाटक सरकार में जल्द ही मंत्रिमंडल फेरबदल हो सकता है।
  • शिवकुमार और सिद्धारमैया गुटों के बीच बेहतर तालमेल के लिए नए समन्वय तंत्र की घोषणा की जा सकती है।
  • असंतुष्ट विधायकों और मंत्रियों को नए जिम्मेदारियां भी दी जा सकती हैं।

राहुल गांधी से नेताओं की मुलाकातें इसी दिशा में एक संकेत के रूप में देखी जा रही हैं।

कर्नाटक कांग्रेस संकट फिलहाल पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। लेकिन दिल्ली में राहुल गांधी के साथ नेताओं की मुलाकातों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हाईकमान स्थिति को संभालने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठा रहा है।
प्रियांक खड़गे की अलग मुलाकात ने इस राजनीतिक हलचल को और दिलचस्प बना दिया है, और आने वाले दिनों में पार्टी के अंदर कुछ बड़े निर्णय देखने को मिल सकते हैं।

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